अधिकारियों के अनुसार अफीम की खेती में किसानों और नारकोटिक्स विभाग के
बीच मुखिया सेतु होता है. मुखिया ही उस गांव में अफीम की काश्त का नाप तौल
और हिसाब करता है.
कमलेश अपने गांव में अपने पिता को मुखिया बनवाना चाहते थे लेकिन पात्रता के बावजूद किसी और को मुखिया बना दिया गया.
ब्यूरो के अधिकारियों की मीणा पर काफी समय से नज़र थी, इसीलिए कमलेश और मीणा के फोन निगरानी में रखे गए.
सब कुछ फ़िल्मी कथा की तरह हुआ. ब्यूरो ने मीणा पर नज़र रखी. गणतंत्र दिवस पर जैसे ही मीणा अपने घर से समारोह के लिए निकले, उनकी गाड़ी को दो नारकोटिक्स कर्मचारी बाइक पर एस्कॉर्ट करते हुए चले.
अभियुक्त मीणा ने झंडारोहण किया और बीस मिनट तक ईमानदारी पर भाषण दिया. फिर घर लौटे और जैसे ही कमलेश ने एक लाख रूपये की रिश्वत दी ,उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.
राजस्थान में सवाई माधोपुर ज़िले के मीणा कोई तीन दशक से सरकारी सेवा में हैं. जाँच में लगे अधिकारियों के अनुसार उन्हें निलंबित कर दिया गया है.
मगर इस बारे में कोटा स्थित नारकोटिक्स विभाग से सम्पर्क किया गया तो कहा गया उन्हें इसकी जानकारी नहीं है.
नारकोटिक्स विभाग के मुख्यालय ग्वालियर में भी कोई भी अधिकारी इस मामले में बात करने को तैयार नहीं हुआ. ब्यूरो के मुताबिक, आरोपी मीणा के कई लॉकर और बैंक अकाउंट है.
मीणा के पास जयपुर में 106 भूखंड होने के कागज़ात मिले है.
इनमें खुद मीणा के नाम 23, पुत्र मनीष के नाम 23, पत्नी प्रेमलता के नाम 42, रिश्तेदारों के नाम से 12 और पत्नी के नाम 42 दुकानों के आवंटन के कागज़ मिले हैं.
मुंबई में पुत्र के नाम एक फ्लैट है. इसके अलावा कई वाहन और जयपुर में मकान है. इसमें जयपुर के जगतपुरा स्थित मकान में तीन अटैचियों में रखे दो करोड़ 26 लाख रूपये मिले.
ब्यूरो के अधिकारियों ने अभियुक्त मीणा से पूछा कि जब उनकी पगार डेढ़ लाख रुपया मासिक है तो इतनी संपत्ति कैसे अर्जित की. अब तक की पूछताछ में अभियुक्त ने खुद को पाक साफ़ बताया है.
उधर अफीम की खेती करने वाले किसानो के संगठन का आरोप है कि पिछले कई सालों से नारकोटिक्स विभाग में भ्रष्टाचार का खुला खेल चल रहा था.
राजस्थान के सात जिलों में अफीम की खेती की इजाज़त है और इसके लिए सरकार किसानों को कुछ शर्तो के साथ खेती की अनुमति देती है.
भारतीय अफीम किसान विकास समिति के अध्यक्ष चौधरी रामनारायण ने कहा 'किसान अर्से से भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, पर कोई नहीं सुन रहा था. मुझे सुखद आश्चर्य हुआ जब एंटी करप्शन विभाग ने कार्यवाही की क्योंकि हम शिकायतें करते करते थक गए थे
अफीम उत्पादक किसान पिछले 445 दिन से चितौड़गढ़ जिला मुख्यालय पर धरने पर बैठे हैं. इस धरने में अफीम किसानों की समस्याओ के समाधान की मांग की जा रही है. इसमें भ्रष्टाचार का मुद्दा भी शामिल है.
समिति के अध्यक्ष चौधरी कहते है, "हम दिल्ली जाकर जंतर मंतर पर भी धरना दे चुके है. मगर किसान की व्यथा कौन सुनता है. सरकारी अफसरों ने ऐसी-ऐसी नीतियाँ बनाई हैं कि उसके ज़रिए किसानों से रकम वसूली जा सके."
चौधरी का आरोप है कि विभाग के अफसर अवैध काम में लगे हुए है. "वे किसानों को अफीम की खेती का लाइसेंस रद्द करने की धमकी देकर पैसा वसूलते हैं.
वो बताते हैं कि केंद्र सरकार को पचासों चिठ्ठियां लिखी, ज्ञापन भेजे और अपना दर्द बयान किया. मगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा. चौधरी के मुताबिक वे तीन बार अभियुक्त अफसर सहीराम मीणा से मिले और उनके विभाग में रिश्वत के कारोबार की शिकायत की.
कोटा में अफीम किसान संघर्ष समीति के भवानी सिंह धरतीपकड़ ने कहा, "विभाग के अधिकारी किसानों की उपज को घटिया बताकर पट्टा ख़ारिज करने की धमकी देकर पैसा वसूलते रहे."
वो कहते हैं, "जब-जब अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और किसानों की बैठक होती, हम ये मुद्दे उठाते और उम्मीद करते कि कुछ होगा. मगर हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. इन बैठकों में कोटा, चित्तौड़ और झालावाड़ के सांसद भी मौजूद होते थे. हम हर बार भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते रहे. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई."
धरतीपकड़ कहते है अफीम के खेती से परिवार का गुज़र-बसर हो जाता है, क्योंकि बाकी फसलों में अब पेट पालना मुश्किल होता है. यही अफीम पैदा करने वाले किसान की मजबूरी है और इसका अधिकारी फायदा उठाते रहे हैं.
कमलेश अपने गांव में अपने पिता को मुखिया बनवाना चाहते थे लेकिन पात्रता के बावजूद किसी और को मुखिया बना दिया गया.
ब्यूरो के अधिकारियों की मीणा पर काफी समय से नज़र थी, इसीलिए कमलेश और मीणा के फोन निगरानी में रखे गए.
सब कुछ फ़िल्मी कथा की तरह हुआ. ब्यूरो ने मीणा पर नज़र रखी. गणतंत्र दिवस पर जैसे ही मीणा अपने घर से समारोह के लिए निकले, उनकी गाड़ी को दो नारकोटिक्स कर्मचारी बाइक पर एस्कॉर्ट करते हुए चले.
अभियुक्त मीणा ने झंडारोहण किया और बीस मिनट तक ईमानदारी पर भाषण दिया. फिर घर लौटे और जैसे ही कमलेश ने एक लाख रूपये की रिश्वत दी ,उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.
राजस्थान में सवाई माधोपुर ज़िले के मीणा कोई तीन दशक से सरकारी सेवा में हैं. जाँच में लगे अधिकारियों के अनुसार उन्हें निलंबित कर दिया गया है.
मगर इस बारे में कोटा स्थित नारकोटिक्स विभाग से सम्पर्क किया गया तो कहा गया उन्हें इसकी जानकारी नहीं है.
नारकोटिक्स विभाग के मुख्यालय ग्वालियर में भी कोई भी अधिकारी इस मामले में बात करने को तैयार नहीं हुआ. ब्यूरो के मुताबिक, आरोपी मीणा के कई लॉकर और बैंक अकाउंट है.
मीणा के पास जयपुर में 106 भूखंड होने के कागज़ात मिले है.
इनमें खुद मीणा के नाम 23, पुत्र मनीष के नाम 23, पत्नी प्रेमलता के नाम 42, रिश्तेदारों के नाम से 12 और पत्नी के नाम 42 दुकानों के आवंटन के कागज़ मिले हैं.
मुंबई में पुत्र के नाम एक फ्लैट है. इसके अलावा कई वाहन और जयपुर में मकान है. इसमें जयपुर के जगतपुरा स्थित मकान में तीन अटैचियों में रखे दो करोड़ 26 लाख रूपये मिले.
ब्यूरो के अधिकारियों ने अभियुक्त मीणा से पूछा कि जब उनकी पगार डेढ़ लाख रुपया मासिक है तो इतनी संपत्ति कैसे अर्जित की. अब तक की पूछताछ में अभियुक्त ने खुद को पाक साफ़ बताया है.
उधर अफीम की खेती करने वाले किसानो के संगठन का आरोप है कि पिछले कई सालों से नारकोटिक्स विभाग में भ्रष्टाचार का खुला खेल चल रहा था.
राजस्थान के सात जिलों में अफीम की खेती की इजाज़त है और इसके लिए सरकार किसानों को कुछ शर्तो के साथ खेती की अनुमति देती है.
भारतीय अफीम किसान विकास समिति के अध्यक्ष चौधरी रामनारायण ने कहा 'किसान अर्से से भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं, पर कोई नहीं सुन रहा था. मुझे सुखद आश्चर्य हुआ जब एंटी करप्शन विभाग ने कार्यवाही की क्योंकि हम शिकायतें करते करते थक गए थे
अफीम उत्पादक किसान पिछले 445 दिन से चितौड़गढ़ जिला मुख्यालय पर धरने पर बैठे हैं. इस धरने में अफीम किसानों की समस्याओ के समाधान की मांग की जा रही है. इसमें भ्रष्टाचार का मुद्दा भी शामिल है.
समिति के अध्यक्ष चौधरी कहते है, "हम दिल्ली जाकर जंतर मंतर पर भी धरना दे चुके है. मगर किसान की व्यथा कौन सुनता है. सरकारी अफसरों ने ऐसी-ऐसी नीतियाँ बनाई हैं कि उसके ज़रिए किसानों से रकम वसूली जा सके."
चौधरी का आरोप है कि विभाग के अफसर अवैध काम में लगे हुए है. "वे किसानों को अफीम की खेती का लाइसेंस रद्द करने की धमकी देकर पैसा वसूलते हैं.
वो बताते हैं कि केंद्र सरकार को पचासों चिठ्ठियां लिखी, ज्ञापन भेजे और अपना दर्द बयान किया. मगर सब कुछ ऐसे ही चलता रहा. चौधरी के मुताबिक वे तीन बार अभियुक्त अफसर सहीराम मीणा से मिले और उनके विभाग में रिश्वत के कारोबार की शिकायत की.
कोटा में अफीम किसान संघर्ष समीति के भवानी सिंह धरतीपकड़ ने कहा, "विभाग के अधिकारी किसानों की उपज को घटिया बताकर पट्टा ख़ारिज करने की धमकी देकर पैसा वसूलते रहे."
वो कहते हैं, "जब-जब अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और किसानों की बैठक होती, हम ये मुद्दे उठाते और उम्मीद करते कि कुछ होगा. मगर हालत में कोई सुधार नहीं हुआ. इन बैठकों में कोटा, चित्तौड़ और झालावाड़ के सांसद भी मौजूद होते थे. हम हर बार भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाते रहे. लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई."
धरतीपकड़ कहते है अफीम के खेती से परिवार का गुज़र-बसर हो जाता है, क्योंकि बाकी फसलों में अब पेट पालना मुश्किल होता है. यही अफीम पैदा करने वाले किसान की मजबूरी है और इसका अधिकारी फायदा उठाते रहे हैं.
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